Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 19, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
पञ्चानां संविदां पञ्च भिन्नान्यङ्गान्यसावथ ।
बुध्यते तानि तद्रूपरन्ध्राण्यनुभवत्यपि ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसके बाद पाँच
इन्द्रियों के अलग-अलग पांच स्थानों के रूप में यह अपना अनुभव करता है ओर उनके स्थानभूत
अलग-अलग रूप आदि के उपभोगद्रारों का भी अनुभव करता है