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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 19, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

आत्मन्यथेन्दुबिम्बात्मन्यसौ संवित्तिपञ्चकम् । काकतालीयवद्भिन्नमुदितं चेतति स्वयम् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

विराट देह में उसके भरोगर की उपपत्ति के लिए समष्टिरूय मन से आदित्यादि रुप पाँच इन्द्रियों ओर उनके स्थलभेद की कल्पना को कहते हैं / अनन्तर चन्द्रबिम्बस्वरूप अपने स्वरूप में काकतालीय न्याय के सदृश अकस्मात्‌ उत्पन्न हुई भिन्न-भिन्न पांच इन्द्रियों के रूप में यह स्वयं प्रकाशित होने लगता है