Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 19, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
मनोमयोऽसावुदितः परस्मात्प्रथमोत्थितः ।
आकाशविशदः शान्तो नित्यानन्दविभामयः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
उनके मनोमयरूप होने पर भी स्वत:प्रिद्ध जानेश्वर्य से एव सब शक्तियों से सम्पन्न होने के
कारण वह जीव और इश्वर दोनों रूप है, इस अभिप्राय से कहते हैं /
यह मनोमयरूप से उदित हुआ हिरण्यगर्भ सर्वप्रथम परब्रह्म से आविर्भूत है, अतः आकाश
के समान विशद, शान्त, नित्य, आनन्दस्वरूप एवं प्रकाशमय है