Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 19, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
स्वयमेवाशु भवति स्वयमेव विलीयते ।
स्वयमेव प्रसरति स्वयं संकोचमेति च ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
ईश्वररुप होने से वह अपने आविभवि और तिरोभाव में बिलकुल स्वतन्त्र है, यह कहते हैं ।
सर्वशक्ति-सम्पन्न होने से वह शीघ्र ही स्वयं आविर्भूत होता है, स्वयं विलीन हो जाता है,
स्वयं विस्तार को प्राप्त होता है तथा स्वयं ही संकोच को भी प्राप्त हो जाता है