Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 19, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
मूलं शरीरवृक्षस्य बीजं कर्मद्रुमस्य च ।
प्रसवात्सर्वभावानामिन्दुरानन्दकारणम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
बीजादिभाव भी मन का ही होता है, यह कहते हैं ।
चन्द्ररूपी मन ही शरीररूपी वृक्ष का मूल, कर्मरूपी वृक्ष का बीज तथा सम्पूर्ण भाव पदार्थों का
उत्पादन करने एवं अन्नादिरूप से वर्धन करने से आनन्द का कारण है