Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 19, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
अस्मादिन्दुविराड्जीवात्प्रसरन्ति जगत्त्रये ।
जीवा मनांसि कर्माणि सुखान्यत्रामृतानि च ॥ ३२ ॥
विराज एते संकल्पा ब्रह्मविष्णुहरादयः ।
तस्य चित्तचमत्काराः सुरासुरनभश्चराः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
उम्नीको फिर स्पष्टरूप से कहते हैं
इस चन्द्ररूपी विराट् जीव से इन तीनों लोकों में सब जीव कर्म, मन, विषयभोग तथा मोक्ष
प्रवृत्त होते हैं