Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 19, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
चित्स्वभावो बुध्यमानः प्रालेयपरमाणुताम् ।
यदादौ भावयत्याशु तदा तत्रैव तिष्ठति ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस चन्द्ररूपी विराटजीव के संकल्पस्वरूप ही ये ब्रह्मा (७) विष्णु और
भगवान् शंकर आदि देवता हैं तथा उसी के चित्त के चमत्काररूप ये सुर, असुर और पक्षी आदि
नाना प्रकार के जीव-समुदाय हैं ॥३ ३॥
चित्तउपहित विति के विवर्तय से चित्त की चमत्कारता को प्रकट करते हैं /
सृष्टि के आदि में चन्द्रमा की अत्यन्तसूक्ष्म अमृत कलात्मता को साक्षीरूप से जान रहा विराट्
प्रजापति जब देवतादि के शरीराकार का संकल्प करता है, तब शीघ्र वह चतुर्मुखादि शरीरभाव में
ही स्वयं सिद्ध की नाई स्थित हो जाता है, तात्पर्य यह कि वह सत्यसंकल्पवाला होने से शीघ्र
संकल्पितरूप में ही परिणत हो जाता है