Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 19, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
तेनैतदेव जीवस्य स्थानं विद्धि रघूद्वह ।
पञ्चावयवमेतत्तच्छरीरमनुभूयते ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए, हे रघुद्रह, इस चन्द्रमण्डल को ही आप
सम्पूर्ण जीवसमष्टिरूप विराट् जीव का स्थान और अपंचीकृत पंचभूतावयवयुक्त शरीर समझिये
इसी का जाग्रदवस्थारूप से सबको अनुभव होता है