Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 19, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 19, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 19 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
यस्य यस्य पदार्थस्य यो भावस्तेन तत्र तम् ।
स्थितं विद्धि तदाभासं तदात्मैकान्तवेदनात् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जीव की स्वव्याफकता को अनुभव पर बढ़ाते हैं
जिस-जिस पदार्थ का जो असाधारण स्वरूप है, उस-उस पदार्थ में उस-उस रूप से
स्थित उसी जीव को ही आप जानिए, इसलिए उस-उस पदार्थ के रूप में जीव ही भासमान
होता है क्योकि बार-बार देखने पर तत्-तत् पदार्थों के आकार में ही उसका अनुभव होता
है, यह अकाट्य नियम है । तात्पर्य यह है कि घट और चक्षु का सम्बन्ध होने पर चक्षु के द्वारा
निकला हुआ अन्तःकरण स्ववृत्ति में सम्बद्ध घटावच्छिन्न जीवचैतन्य को ही “यह घट प्रकाशित
होता है” इस रूप से घटस्वभाव के तादात्म्यरूप से ही अनुभव कराता है