Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 190, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 190, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 190 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
ज्ञप्त्यात्मिका श्रीस्तत्रस्था तादृशेरनुभूयते ।
व्योमात्मिका तु न भवेन्न सत्तामसदेति हि ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
चिदेकरस ब्रह्म की इस तरह की दुर्दशा कहाँ संभव है, किन्तु यह सब संसार दुर्दशादि भ्रान्ति
ही हे । अथवा ब्रह्म ही कोतुक से जगत्, जीव आदि के आकार में स्फुरित हुआ है। अपना आकार अपनी
दुर्दशा कदापि नहीं कहा जा सकता, यह अर्थ हे