Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
भ्रान्तिरेवेयमाभाति जगदाभासरूपिणी ।
भ्रान्तिरेवापि वा नैव ब्रह्मसत्तैव केवला ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
यहाँ पर श्रीरामचन्द्रजी जिन शंकाओं का पहले समाधान हो चुका था उनका भी सब के उपकार
के लिए प्रश्नोत्तर माला के क्रम से उद्घाटनकर समाधान क्रम को प्रख्यात कराने के लिए उनका
उपाय पहले पृषते है ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, यहाँ पर ज्ञान की ज्ञेयता शान्ति कैसे होती है ओर उसका दुढाभ्यास
होने पर बन्धता-बुद्धि कैसे निवृत्त होती है ?