Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 32
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हिन्दी अर्थ
यों वस्निष्ठजी द्वारा निरुत्तर किये गये श्रीरामचन्द्रजी प्रबोध की दढता के अभाव से पूर्णरूप से
निस्सन्देह न होने के कारण प्रश्न करने में अपनी अशक्ति ही दिखलाते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, भ्रान्ति को जैसा प्राप्त हुआ मैं अब और क्या पूछूँ यह नहीं जान
रहा हूँ। मैं पूर्णरूप से प्रबोधवान् नहीं हुआ हूँ। इस विषय में अब क्या पूछूँ ?