Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 33
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हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, निरुत्तर करने के कारण केवल अप्रतिभा से प्रश्न करने
से विरत न होओ, किन्तु प्रश्न करने में कारणभूत सन्देह बीज के निकषोपल के समान (कसौटी के
तुल्य) सार ओर असार की परीक्षा का स्थान मुझसे तब तक पूछते जाओ जब तक कि कारण का नाश
होने से आप निश्शंक न होओ ।तव क्रम से प्रश्न के कारणभूत सन्देहो का ओर उनके कारण अज्ञान का
पूर्णरूप से विनाश होने के कारण आप परम स्वभाव मेँ विश्रान्ति को प्राप्त होओगे