Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verses 35–36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 35,36
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हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, कारण का अस्तित्व न होने से तथा सर्वत्र शान्त ब्रह्म की सत्ता होने से
दृश्य आदि की भ्रान्ति नहीं हे । आपको केवल अभ्यास न होने के कारण ही परमपद में विश्रान्ति नहीं
प्राप्त हो रही हे ।
यदि आप मेरे द्वारा वर्णित सिद्धान्त को जानते है तो अनभ्यासवश ज्ञान की परिपक्वता न होने से
परमपद में अविश्रान्ति ही आपके वृथा विविध सन्देहो की जननी है, यह श्रीवसिष्ठजी के उत्तर का
आशयहै।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, कहाँ से अनभ्यास होगा, कहाँ से अभ्यास होगा तथा अभ्यासात्मक
यह जगद्भ्रान्ति ही कहाँ से उदित हुई है जव कि जगद्भ्रान्ति का कोई कारण ही नहीं है ?