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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 49

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 49

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, ज्ञेय अर्थ में सत्यताका आग्रह होने पर पुनः बन्धन की प्रसक्ति होती है। किन्तु तत्त्वज्ञानियों की दृष्टि में वह (ज्ञेय) निपट नहीं है, क्योकि तत्त्वज्ञान से उनका बाघ हो जाता है। ज्ञप्ति ही उनके प्रारब्ध के भोग के लिए सकल पदार्थों के आकार से भासती है, इसलिए उनके पुनर्बन्धन आदि की कल्पना का प्रसंग नहीं है