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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 50

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, ज्ञप्ति सर्वार्थरूपा नहीं है,क्योंकि जैसे प्रकाशक दीपक या नील, पीत आदि रूप या घट, पट आदि अपनी स्थिति को प्राप्त होते हैं वैसे ही ज्ञप्तिवश बाह्य घट, पट आदि पदार्थस्थिति प्रथित होती है अतः प्रत्यक्षरूप से ग्रहण होने से बाह्य पदार्थो की चेतन से पृथक्‌ सत्ता सिद्ध हो गई