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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 53

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 53

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार जैसा स्वप्न हे, वैसी ही जगद्‌-स्थिति है यानी जगत्‌ की स्वप्नतुल्यता है, यह जब सिद्ध हो गया तब जैसे जागरण होने पर स्वप्न के पदार्थो का बाध हो जाता है वैसे ही आत्मज्ञान होने पर जागतिक पदार्थो में पिण्डग्रहता का (साकारता यानी स्थूलता का) बाध हो जाने से दुःख शान्त हो जाता है । ऐसी परिस्थिति में पदार्थो की पिण्डग्रहता (स्थूलता) सारी की सारी भ्रान्ति रूप ही हे, यह बात अर्थतः कही ही गई है