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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 52

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 52

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, जब तक रहता है तब तक अर्थक्रियाकारी होने से स्वप्न सत्य हो चाहे प्रबोध से बाध्य होने के कारण असत्य हो, जब तक रहता है तव तक दुःख होता हे वैसे ही यह जगद्भ्रान्ति जब तक रहती है तब तक दुःख देती है । इसकी चिकित्सा का (निवृत्ति का) कौन उपाय है ?