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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 75

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 75 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 75

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, जाग्रत्‌ जगत्‌ स्वप्न जगत्‌ के समान असत्‌ होता हुआ भी सतूसा प्रतीत होता है इसका कोई कारण नहीं है, यह कभी उत्पन्न नहीं हुआ है ओर स्वप्न के समान उद्भूत हुआ यह स्वप्नवत्‌ अर्थक्रियाकारी भी प्रतीत होता है