Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 78
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 78 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 78
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हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, स्वप्न और मनोराज्य आदि कल्पनाओं में संस्काररूप से जाग्रत्
में प्रसिद्ध अर्थ का ही नित्य भान होता है यही बात मनोरथ, भ्रम आदि में भी समझनी चाहिये