Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
चिद्भात्येव हि सर्गादौ कचन्ती भाति सर्गवत् ।
भासनीयं च भानं च रूपं यत्र स्वयंप्रभा ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, बाहरी पदार्थो की भ्रान्ति से यहाँ पर भ्रमबुद्धि उदित हुई यह
जानना चाहिये । बाह्य ओर आभ्यन्तर किरी भी पदार्थ का संभव नहीं हे । भाव यह कि असत्ता अभान
अथवा अर्थक्रिया की असामर्थ्य में कारण नहीं है क्योकि स्वप्न और भ्रान्तिज्ञान में हजारों असत्
पदार्थों में भान ओर अर्थक्रिया सामर्थ्य देखी जाती है, किन्तु वाध ही अभाव ओर अर्थक्रिया की असामर्थ्य
में प्रयोजन है । वाध विचारवानों को प्रत्यक्ष ही है