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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

एकैव चित्र्त्रयं भूत्वा सर्गादौ भाति सर्गवत् । एष एव स्वभावोऽस्या यदेवं भाति भासुरा ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिनायक, जो यह प्रत्यक्ष दृश्य त्वम्‌, अहम्‌ आदि भूतादि अर्थ अनुभूत है वह कैसे नहीं है यह मुझसे कहिये यानी लौकिक प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो से सिद्ध पदार्थ का अपलाप केसे संभव है ? यह कहने की कृपा करें