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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 191, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 191, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 191 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

एतत्तु स्वप्नसंकल्पनगरेष्वनुभूयते । इत्थं नाम तपत्येषा चिद्दीप्तिः प्रथमोदिता ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे निष्पाप, आदि सृष्टि मेँ ही विराट्‌ आदिरूप कोई पदार्थ उत्पन्न नहीं हुआ, इसलिए ज्ञेय का संभव नहीं है। आदि सृष्टि में जगत्‌ की माया से अतिरिक्त सामग्री कदापि नहीं कही जा सकती, अतएव उस समय मायिक जगत्‌ भ्रान्ति से अतिरिक्त न था यह अवश्य मानना होगा इस समय भी वह वैसे ही भ्रान्तिमात्र ही है यह कहना होगा। रह गई लौकिक प्रत्यक्ष आदि की बात सो वे केवल व्यवहार के अविसंवाद से चरितार्थ हैं, अतः तत्त्वपूर्ण युक्तियों और श्रुतियों द्वारा बाधित हो जाते हँ । इस विषय में भगवती श्रुति भी है (न निरोधो न चोत्पत्ति्न बद्धो न न च साधक: । न मुमुश्षुर्न वै मुक्त त्येषा परमार्थता- यानी न विनाश है, न उत्पत्ति है, न कोई बद्ध है ओर न कोई साधक है एवं न कर मुमुश्च है ओर न मुक्त है यह परमार्थता है