Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 192, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 192 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
सर्वं शान्तं निरालम्बं विज्ञानं केवलं स्थितम् ।
अनन्तं चिद्धनं व्योम नीरागमपकल्पनम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी के कथन का अनुमोदन कर रहे श्रीवसिष्ठजी यह कहते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, आपने ठीक समझा है । काकतालीय के समान अतर्कनीय
अविद्या से अपने में अपने से जिस ब्रह्म का भान होता है जीवभूत उसी ब्रह्म से आत्मा ही (स्वरूप ही)
“जगत्' जाना जाता है