Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 192, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 192 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
इत्थं द्वैतमिदं भातमिमे लोका इमेऽद्रयः ।
परमाकाशमित्यच्छमेवानच्छमिव स्थितम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्यत्र न देखे गये (उदाहरणशून्य) अत्यन्त आश्व्यभूत इसकी प्रमाणानुभव के बल से संभावना
करनी चाहिये यो श्रीवसिष्ठजी संभावना करते है ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, यह इस प्रकार का यानी अत्यन्त आश्चर्यरूप ही हे, क्योकि
"विभुं चिदानन्दामरूपमदभुतम्" (सर्वव्यापक चिदानन्दस्वरूप रूपरहित अद्भुत) ऐसे श्रुति है और
"आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्" (कोई इसे आश्चर्य सा देखता है) यों भगवान् का वाक्य है तथापि
असंभावना नहीं करनी चाहिये । अन्वय और व्यतिरेकरूप से परीक्षा कर आप देखिये । क्योकि वही
चितिरूप सूर्यादि प्रभा की भी प्रभा अन्धकार काल में अपनेसे ही प्रथित होती रहती हे । सूर्योदय होने के
बाद प्रकाश आदि के साथ भी वह रहती हे