Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 192, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 192 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
सर्गादौ परलोकादौ स्वप्नादौ कल्पनादिके ।
चिदेव चेत्यवद्भाति कुतोऽन्या किल दृश्यधीः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
सूर्यादि का प्रकाश भी दीवार आदि में निरपेक्ष स्वभाववाला
होकर दीवार में प्रकाशित सा होता है । उसकी प्रकाशता में दीवार का कोई हाथ नहीं है । बल्कि दीवार
और दीवार का भासना उसकी स्वप्रकाशता के बल से ही होता है । प्रकाश की स्वरसतासे ही दीवार की
प्रतीति होती है । वहाँ पर जैसे दीवार आदि के सम्बन्ध से पहले आकाश में प्रकाश दिखाई देता हे वैसे
सृष्टि के आदि में ओर प्रलय में भी वक्ता श्रोता इस निर्विषय आत्मा को ही आप देखिये