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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 192, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 192 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

स्वर्गे वा नरके वापि स्थितोऽस्मीति मतिर्यदि । तत्तस्या नरकस्यान्तो दृश्यं संविन्मयात्मकम् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह निरालम्ब चित्‌की संभावना की सिद्धि होने से वही सृष्टि के आदि में जगत्‌ के आकार से सम्पन्न हुई यह आप संभावना कीजिये, ऐसा कहते है। इसलिए न द्रष्टा है ओर न दृश्य ही हे । द्रष्टा, दृश्य, दर्शन आदि त्रिपुटी कुछ नहीं है केवल निर्विकार चिदाकाश ही है । चित्‌ प्रभा ही अपने से भित्ति (मूर्तं आलम्बन) तथा उसका भासन आदि रूप धारण करती है