Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 192, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 192, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 192 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
नेदं दृश्यं न च द्रष्टा न सर्गो न जगन्न चित् ।
न जाग्रत्स्वप्नसिद्धादि किमपीदं तदप्यसत् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
एक रूप ही चित् की द्रष्टा, दृश्य, दर्शनरूप त्रिपुटी स्वप्न आदि मे भी प्रसिद्धि ही है, ऐसा कहते हैं ।
जैसे एक ही चित्प्रभा स्वप्न आदि में द्रष्टा, द्रश्य आदि त्रिपुटीरूप होती है वैसे ही जाग्रत् में भी
एकमात्ररूप वह चिति द्रष्टा, दृश्य और दर्शनरूप त्रिपुटी को धारण कर विराजमान होती है