Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 193, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 193, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 193 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
अनादिमध्यपर्यन्तं न देवा नर्षयो विदुः ।
यत्पदं तदिदं भाति क्व जगत्क्व च दृश्यता ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
सकल सन्देहो की निवृत्ति होने से भलीभाँति बुद्ध हुए श्रीरामचन्द्रजी जैसे सोकर जागा हुआ पुरुष
स्वप्नभ्रान्ति का स्मरण करता है वैसे ही संसार-भ्रान्ति का आश्चर्यरूप से स्मरण करते हुए कहते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे गुरवर, महान् आश्चर्य है। हम लोग चिरकाल तक संसाररूप निःसीम
आकाश में वर्तमान इस ब्रह्माण्ड के एक प्रदेश में एकमात्र आत्मतत्त्व से अपरिज्ञात होने के कारण
भ्रान्ति में पड़े हैं
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ इक्यानबेवाँ सर्ग समाप्त एक सौ बानबेवाँ सर्ग प्रबुद्ध हुए श्रीरामचन्द्रजी का अपने प्रबोध को श्रीवसिष्ठजी की शुभसन्निधि में जैसा यह चिन्मात्र है वैसा विस्तार से कथन |