Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 193, Verses 2–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 193, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 193 · श्लोक 2,3
संस्कृत श्लोक
द्वैताद्वैतसमुद्भेदवाक्यसंदेहविभ्रमैः ।
अलमस्माकमाशान्तमाद्यं रूपमनामयम् ॥ २ ॥
व्योमनि व्योमभावानां प्रशान्तं यादृगासितम् ।
तादृक्चिद्व्योमनि स्फारत्रिजगद्व्योमभासनम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
किन्तु आत्मतत्त्व के परिज्ञात होने पर यह सम्पूर्ण जगद्भ्रान्ति कुछ भी नहीं
है। न तो यह कभी हुई, न है और न होगी ।
बरहदारण्यवार्तिक में श्रीसुरेश्वाचार्यजी ने कहा है :
तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थसम्यग्धीजन्ममात्रतः । अविद्या सह कार्येण नासीदस्ति भविष्यति ॥
अथात् (तत् त्वमसि“ इत्यादि वेदान्त वाक्यो के श्रवण, मनन ओर निदिध्यासन से उत्पन्न सम्यक्
ज्ञान के (तत्त्वबोध के) जन्ममात्र से अपने कार्यभूत जगत् के साथ अविद्या भ्रान्ति नहीं थी, नहै और न
भविष्य में रहेगी यह सारा जगत् शान्त, आलम्बन रहित, विज्ञानघन, असीम, कल्पना शून्य, नीराग,
अद्वितीय चिद्घनाकाश ही स्थित है