Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 193, Verses 18–20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 193, verses 18–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 193 · श्लोक 18-20
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हिन्दी अर्थ
वन्ध्या के पुत्र के तुल्य उसकी सत्ता कैसे हो सकती है ? इसलिए कदापि किसी भी भ्रान्ति का संभव है
ही नहीं । यह निरावरण विज्ञानघन ही सर्वतःव्याप्त है । आज जो कुछ भी जगत्-नाम-धारी यह
भासिता होता है वह परम ब्रह्म ही हे । निरतिशय आनन्द से परिपूर्णं परम ब्रह्मस्वरूप में वह पूर्ण
परमब्रह्म ही अपनी महिमा मेँ स्थित है