Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 193, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 193, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 193 · श्लोक 22
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
किस प्रकार का वह परमपद स्थित रहता है ? इस प्रश्न पर उसे कहते हैं।
जन्मरहित, मरणशून्य, अन्यलोगों द्वारा रहने के अयोग्य, विद्वान् पुरुषों द्वारा सेवित, अविकारी,
निर्दोष, चारों ओर से परिपूर्ण, “अहम्' ही निरहं (निरहंकार) होकर बोध से उदित सर्वत्र व्याप्त,
शुद्ध आवरण-परिच्छेद का नाश होने से विकास युक्त, अनेक और अद्वितीय रूप से परम पद स्थित
रहता है