Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 193, Verses 9–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 193, verses 9–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 193 · श्लोक 9-11
संस्कृत श्लोक
भावाभावेषु कार्येषु जरामरणजन्मसु ।
ज्ञ आजवं जवीभावे तिष्ठन्नपि न तिष्ठति ॥ ९ ॥
नाविद्यास्ति ह न भ्रान्तिर्न दुःखं न सुखोदयः ।
विद्याऽविद्या सुखं दुःखमिति ब्रह्मैव निर्मलम् ॥ १० ॥
परिज्ञातं सदेतत्तु यावद्ब्रह्मैव निर्मलम् ।
अपरिज्ञातमस्माकमब्रह्मात्म न विद्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुनिनायक, इस भ्रान्ति की कहाँ से उत्पत्ति
होती है ऐसी यदि आलोचना की जाय तो वह भी युक्त नहीं है, क्योकि भ्रान्ति के अभाव का अनुभव
होने से यानी भ्रान्ति के असत् होने से उसके कारण का विचार करना कहाँ उचित है ? विकारविहीन
तत्त्वज्ञान के आस्पद में भान्ति का कदापि संभव नहीं हे । जो कुछ भी यह भ्रमज्ञान है वह भी चित्स्वरूप
परमात्मा ही है, उससे भिन्न नहीं हे । निरवकाश, आदि-अन्तशून्य (असीम) आकाश में या पर्वत के
(चट्टान के) मध्यमे अथवा स्फटिक शिला के गर्भ में ओर निर्विकार ज्ञानरूप परमपद में भेद की
कल्पना करनेवाला अन्य कौन हो सकता है ?