Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 194, Verses 10–11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 194, verses 10–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 194 · श्लोक 10,11
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
यहाँ वास्तव में न अज्ञान है, न भ्रम है, न दुःख है और न
सुखोदय है । ज्ञान, अज्ञान, सुख, दुःख सब कुछ निर्मल ब्रह्म ही हे । यथार्थरूप से परिज्ञात यह सब कुछ
निर्मल ब्रह्म ही हे । हम तत्त्वज्ञानियों की दृष्टि मेँ अपरिज्ञात अब्रह्मात्म (ब्रह्मभिन्न) कुछ नही है यानी
सब कुछ परिज्ञात होकर ब्रह्मरूप ही है