Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 194, Verses 12–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 194, verses 12–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 194 · श्लोक 12-15
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
हे गुरुवर, आपकी कृपा से मैं प्रबुद्ध हो गया हूँ, मेरी
सकल कुदृष्टियाँ शान्त हो गई हैँ । इस प्रकारका (ज्ञानवान्) मै त्रैलोक्य को शान्त, सकलद्वेत विषमता-
शून्य चिदाकाशरूप देखता हूँ। भलीभाँति परिज्ञात यह सारा जगत् केवल ब्रह्म ही हे । न मैं पहले कोई
दूसरा था ओर न इस समय कोई दूसरा हूँ। पहले में अज्ञतात्म (जिसने अपने रूप को नहीं जाना) ब्रह्म
था इस समय ज्ञात आत्मा में ब्रह्म ही स्थित हे । जैसे शून्यत्व, एकत्व तथा नीलता में आकाश एकमात्र
है वेसे ही एक अजर अमर ब्रह्म अपने से अतिरिक्त ज्ञानअज्ञाननिभसि शून्य हे । इसलिए ज्ञान होने के
कारण मैं निर्वाणरूप होकर स्थित हूँ, अज्ञान की निवृत्ति से ही सकल शंकाओं की निवृत्ति होने के
कारण निःशंक होकर स्थित हूँ, सकल अभिलाषाओं की निवृत्ति से मे निस्पृह होकर स्थित हूँ। विक्षेपशून्य
आत्मसुख में ही धाराप्रवाह से चित्तवृत्ति जैसे रहे वैसे मैं स्थित हूँ । यथास्थित नित्य में अनेकरूप से
स्थित हू। इस प्रकार प्रबुद्ध हुआ मैं समस्तात्मरूप ब्रह्म मे केसे स्थित नहीं हूँ, क्योकि ब्रह्मभाव से
प्रच्युति के हेतुभूत मेरे अज्ञान का बाध हो चुका हे