Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
इसलिए अध्यासपरम्परा चरम साक्षात्कारबुद्धिपर्यन्त की परिणाम परम्परा से अपने आप ही समाप्त
हो जाती है । उसके समाप्त होने पर स्वप्रकाश होने के कारण प्रबुद्ध आत्मा ही कुहरे के आगमन से सोये
हुए से मध्याह मे कुहरे के बिलकुल हट जाने पर सूर्य के समान और सूर्य के ताप के समान प्रबुद्ध होता
है। वही जीव का नित्यप्राप्त निरतिशय आनन्दाभिव्यक्तिरूप परम पुरुषार्थ है, इस आशय से कहते हैं।
जैसे प्रातः काल में कुहरे के आगमन से सोया हुआ सा प्रतीत होनेवाला सूर्य ओर सूर्य का प्रकाश
मध्याह में कुहरे के निःशेष होने पर प्रबुद्ध हो जाता हे वैसे ही प्रबुद्ध ही बोध देश, काल आदि का
अभाव होने पर भी अध्यासवश सुप्त के तुल्य प्रतीत होता है । अध्यास के हट जाने से स्वयं प्रबुद्ध हो
जाता है