Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
दृष्ट यानी समीपवर्ती (प्रत्यक्ष), देश
और काल के व्यवधान से परोक्ष जगद्रूप रश्मियाँ इस परमात्मा में परस्पर सटे बिना (पृथक् पृथक्) वैसे
ही प्रवेश करती हैं, संचार करती हैं जैसे कि एक घर में नाना रत्नों की रश्मियाँ