Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verses 4–5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verses 4–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
उनमें जिन जीवों का समान कर्मवासनानिमित्त अध्यास होता है उनको आपस में एक दूसरे का
अनुभव होता है उनसे अतिरिक्तो को नहीं होता है, इस आशय से कहते हैं।
भगवन्, जैसे जल रहे बहुत से दीपकों का नेत्रवान् लोगों को अनुभव होता है नेत्रहीन लोगों को नहीं
होता वैसे ही देदीप्यमान हो रहे बहुत से सर्गो का समानकर्मवासनाजनित अध्यासवाले किन्हीं लोगों को
परस्पर अनुभव होता है उनसे अतिरिक्तो को नहीं ही होता । आवर्तो के (भँवरों के) क्रीडास्थलभूत
सागर में प्रत्येक जलीय भाग में लवण आदि रस जैसे रहता है वैसे ही उस सृष्टिमें भी जरर जरर मे ब्रह्माण्ड
हैं तथा उन ब्रह्माण्डो में प्रत्येक अणु में सृष्टियाँ है । वास्तविक दृष्टि से न सर्ग है ओर न सर्गो का क्रम ही
है