Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verses 6–7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verses 6–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 6 ,7
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
समुद्र मे जलपरमाणु के रस के तुल्य सर्वत्र सर्वतः व्याप्त चिद्घन परमात्मा का जो नित्य
आत्मवेदन हे । सृष्टि के आधारपरम्परारूप उनकी गणना कोन कर सकता है ? जैसे कही पर भी
अवयवी से अवयविता शब्दभेद के सिवा भिन्न नहीं है वैसे ही परमब्रह्म परमात्मा मे सृष्टि शब्दभेद के
सिवा भिन्न नहीं हे