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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

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हिन्दी अर्थ

बोध ओर वैराग्य के परस्पर से परिवर्धित होने के कारण मैं कृतकृत्य हो गया हूँ, ऐसा कहते है। मेरी निराकरणीय (खण्डनीय) दुश्यरूपी वस्तु का निराकरण हो चुका है, सम्पादनीय कार्य मैंने कर लिया है, तथा दर्शनीय वस्तु पूर्णतया देख ली है । यह सब मंगलमय, शान्त अद्वितीय चिन्मात्र ही है