Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 195, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
आत्मा में रमण करनेवाले शान्त, निर्वासनिक, अहंकारशून्य ज्ञानी पुरुष की आकाश की
निर्मल स्थिति की भाँति संकल्प-विकल्परहित ही स्थिति होती है