Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 196, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
यदि किये कि निर्विकार ब्रह्म ही विवर्तोपादानकारण होकर माया से जगत् के आकार में स्फुरित
होता है तो जगत् शब्द का अर्थ सत्य प्राप्त नहीं होता, ऐसा कहते है।
यदि निर्विकार अजर अमर यह ब्रह्म ही विवर्तोपादान कारण है यह कहो तो जगत् शब्दार्थ की
यथार्थ प्रतीतियाँ कहाँ पर किसको कैसे होंगी ?