Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 196, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
असत् ही यह जगत्
अज्ञान जनित संकल्पवश जो स्फुरित-सा होता है यही बन्धन है ओर असंकल्प की दढता से परिपुष्ट
तत्त्वज्ञान से शान्त हो जाता है यही मुक्ति साधन है । इसकी आत्यन्तिक निवृत्ति ही निर्वाण है यही
मोक्ष-निष्कर्ष हे । वही परमार्थता है