Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verses 29–31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 196, verses 29–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 29,30
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हिन्दी अर्थ
परब्रह्म में परब्रह्म का वेष-सा, कार्य का
अथवा अवयव-सा यह अपर का (जगत्जीवरूप का) भान होता है, वास्तविक विचार करने पर यह
परब्रह्म ही एक हो जाता है । निर्मल शान्त परब्रह्म मे न जगतो का संभव है ओर न जागतिक व्यवहारो
का ही संभव हे । स्वप्न के “यह स्वप्न हे"यो ज्ञात होने पर, मृगतृष्णा के “यह केवल मरु भूमि हे" यों
परिज्ञात होने पर इसी प्रकार दृश्य के भी ब्रह्मरूप से ज्ञात होने पर फिर उसमें सत्यता बुद्धि की भावना
कोन करता है अर्थात् जैसे स्वप्न के “यह स्वप्न है” यह ज्ञात होने तथा मरीचिका के "यह केवल
मरुभूमि है” यह ज्ञात होने पर फिर उनमें सत्यताबुद्धि किसीको भी नहीं होती वैसे ही दृश्य के ब्रह्मरूप
से परिज्ञात होने पर उसमें सत्यताबुद्धि की किंस मूढ को भावना होगी ?