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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verse 35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 196, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 35

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

ब्रह्म के अन्दर जगत्सत्ता वैसी (बीज में अंकुर के तुल्य) नहीं हे किन्तु जगत्ता ही उपलब्ध होती है यह बीज और अंकुर की अपेक्षा ब्रह्म ओर जगत्‌ में विशेषता है । यदि कहिये प्रलयकाल में ब्रह्म में जगत्‌ बीज में अंकुर की नाई ही है तो वह जगत्सत्ता नित्य ब्रह्म ही होगी, क्योंकि ब्रह्म अविकारी है । इसलिए बीजांकुरन्याय की यहाँ पर उपपत्ति नहीं हो सकती, यह भाव है