Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 196, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 38
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हिन्दी अर्थ
पेटी में रत्न की तरह
निराकार ब्रह्म मेँ महाकार (विशाल) जगत् स्थित है यह कथन तो उन्मत्त के प्रलाप के तुल्य ही
होगा, अतएव अश्रद्धेय हे, यह भाव हे