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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verse 47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 196, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 47

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अतः अनिर्वचनीय यह जगत्‌ परमात्मा के स्वरूप के प्रबुद्ध होने यानी ज्ञानवान्‌ होने पर कदापि अनुभूत नहीं होता । उस समय ब्रह्मस्वरूप ही शेष रहता है । अज्ञानतादशा में भी सत्ता ओर असत्ता से परिपुष्ट स्वसंवेदनवेद्यरूप यह अनिर्वचनीय ही है