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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verses 54–59

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 196, verses 54–59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 54-59

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

मेरा यह वाक्य यथार्थ ही है, क्योकि यह अनुभवमूलक है, यों युक्ति के साथ कहते हैं। भगवन्‌, जैसी संवित्‌ (वृत्ति) भीतर स्फुरित होती है वही वाक्यरूप में परिणत होती है, जो बीज भूमि में पड़ता है वही अंकुरता को प्राप्त होता है। शुद्ध ज्ञानमय अद्वितीय आत्मारूप द्वैत और एेक्य से परिवर्तित मैं द्रैत और ऐक्य की कल्पना का तनिक लेश भी नहीं जानता हूँ। ये सब लोग अपने अज्ञान से जीते हुए भी मेरी दृष्टि में एकमात्र ब्रह्म होने से मौनमय सकलचेष्टाओं से रहित जीवन्मुक्त ही है । जैसे आकाश में शून्यता स्थित है वैसे ही वे भी मौन तथा सकल चेष्टाओं से रहित ही स्थित हैं। उनका भोग्य यह जगत्‌ त्वगिन्द्रिय (त्वचा) से वेद्य होने पर भी दीवार पर अंकित चित्र की तरह तथा मनोरथ में उदित हुए नगर की तरह चुपचाप स्थित है। पत्थर से गढ़ी हुई प्रतिमा के तुल्य, उपन्यासमयी काल्पनिक कथा में वर्णित वृत्त की भोति, शम्बर से रचित जैसा यह जगत्‌ आकाश में स्वप्न की तरह उदित है। जो यह जगत्‌ सृष्टि के आरम्भ में ही स्वप्न की तरह ही निराधार (आधारस्तम्भ, भित्ति आदिके बिना) भासता है उसकी भला क्या सत्यता हो सकती है ?