Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verses 49–53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 196, verses 49–53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 49-53
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हिन्दी अर्थ
ब्रह्म में ब्रह्म वृद्धि को प्राप्त होता है ओर आकाश में
आकाश वद्धि को प्राप्त होता है जगत् के आकार से वृद्धि ब्रह्मरूपी आकाश में (निराकार ब्रह्म में) कुछ
भी उपपन्न नहीं हो सकती । द्रष्टा, दर्शन और दुश्यरूप यह में इत्याकारक सृष्टि आदि का भ्रम शान्त
चिदाकाश का ही विस्तार है, यह दीवार आदि (साकार) नहीं हो सकता । जैसे अपना मनोरथकल्पित
नगर सत् नहीं है और उसमें दीवार आदि तो सर्वथा ही असत् हैं वैसे ही यह जगत् भी सुतरां असत् है।
यों केवल अद्वितीय निर्विकार ब्रह्म ही यह हे । यह सम्पूर्ण प्रपंच परमशान्त, निष्क्रिय, वैषयिक आभासहीन,
आदि अन्त शून्य स्वप्रकाश अखण्ड ब्रह्म ही है। जन्म-मृत्युविहीन, शान्त, आदि अन्त रहित, असीम,
निरूपाधि, निराकार निज परमात्मपद को मैं जान चुका हूँ