Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 196, Verses 65–67

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 196, verses 65–67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 196 · श्लोक 65-67

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

सकलशास्त्रीय युक्तियों का अतिक्रमण करनेवाला यानी सकल शासत्रयुक्तियों का अगम्य, सकल पदों से अतीत उस निर्द्न्द्र पद को प्राप्त कर आप सदा ब्रह्माकाशस्वरूप थे । मैं यानी राम और उसके अवयव पैर, हाथ आदि तथा उसके बाह्य घट आदि प्रसिद्ध जगत्‌ है ही नहीं, क्योकि सब कुछ निर्मल सूक्ष्म चिदाकाश ही है । यद्यपि यह सकलपदार्थो का अपलाप मेरी माता बाँझ है, मेरे मुँह में जीभ नहीं हे इत्यादि वाक्य के समान व्याघात, वैतण्डिकत्व आदि दोषों काआधायक होने से तार्किक लोगों के वादों में निन्दनीय हे, इसलिए तार्किको की सभा में शोभा नहीं पा सकता तथापि बहुत से वादियों द्वारा बहुत प्रकार से उपन्यस्त आत्मज्ञानं में परमपुरुषार्थ पर्यवसायी ज्ञान कौन होगा ऐसी परीक्षा (विवेचन) करनेवालोंकी सभा में ही शोभा देता ही हे । सवपिह्व (सर्व का अपलाप) के बिना अनर्थ की आत्यन्तिक निवृत्ति से उपलक्षित निरतिशय आनन्द में प्रतिष्ठा सिद्ध नहीं हो सकती, यह भाव है